जरा सा दिल जहाँ भरा गम
कसूर जमाने का या तेरा सितम
जज़्बातों का समंदर है जज़्बात नहीं कहीं
नदियों में हम बहे या हम पर नदियाँ बही
डूबा तो संसार था उफान हम ही क्यों कहर था
क्यों बस्ती हमारी उजड़ी कायम सारा शहर था
क्यों तेरी रहनुमाई में अहल–ए-सरावत का जोर था
अहम हमारा मजबूर था या अदब कमजोर था
गमों के जंजाल में ज़िन्दगी बहुत छोटी बक्शी
अश्कों के सैलाब की बरास्ता ताक़ीद भी ना की
सजा जिंदगी है मुआफ़ी का कैसा पैबंद है
सुनवाही कोई दर नहीं दरवाज़ा तेरा बंद है
इस इंतिहां की चरम ना उसूल -ए -पैग़ाम है
दो जख के पार बाखुदा सिफ़र भी इम्तिहान है
बहुत छोटी तेरी ये दुनियाँ ए खुदा
सर तामील है तन मुक़र्रर धड़ से जुदा
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











