
मन के भीतर एक दीप जले, तो राह स्वयं बन जाती है।
बाहर चाहे रात घनी हो, दृष्टि सत्य दिखाती है।
जिसने अपने अंतर्मन के मौन प्रश्न को पढ़ना जाना।
उसने जीवन के रहस्यों का पाया गहरा अफसाना।
देह समय की धूल मात्र है, साँसें क्षणिक कहानी,
कौन यहाँ स्थायी ठहरा—राजा, रंक या अभिमानी?
मृगतृष्णा के पीछे भागे, तो जीवन भर प्यास रहे,
अपने भीतर झाँक सके जो, उसके मन में आस रहे।
चेतना जब जागृत होती, मोह के बंधन ढलते हैं,
अहंकार के ऊँचे पर्वत, सत्य-स्पर्श से गलते हैं।
सुख-दुःख दोनों राहगीर हैं, आते-जाते रहते हैं।
जो समभाव हृदय में साधे, वे ही भीतर बहते हैं।
कर्म हमारा मौन लेख है, फल उसका प्रतिध्वनि है।
जैसा बीज हृदय में बोया, वैसी ही अनुभूति है।
जीवन केवल श्वास नहीं है, यह आत्मबोध की यात्रा,
हर पतन में पाठ छिपा है, हर पीड़ा में नव-मात्रा।
जब भीतर का अंधकार मिटे, तब सत्य स्वयं मुस्काता।
चेतना का दीपक जलकर, मानव को मानव बनाता।
मिट्टी होकर मिट जाना ही अंत नहीं इस जीवन का।
अपने भीतर सत्य जगा लें—यही सार है साधन का।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार











