
सरल सहज शुभ्र सौम्य छवि,
उज्ज्वल निर्मल गंभीर शांत,
ममता-मूर्ति, करुणा-सरिता,
हिंदी की अनुपम दिव्य कांत।
कवयित्री, निबंधकार महान,
कहानी में जीवन का स्पंदन,
कोटि-कोटि नमन तुम्हें है,
हे वाणी की अमिट वंदन।
मन की करुणा, सघन वेदना,
गीतों में स्वर पाती रही,
मूक व्यथा के हर स्पंदन को
छंदों में सजाती रही।
सुख-दुख की धूप-छाँव से
जीवन डोरी बुनती रहीं,
वेदना भी मधुर हो उठी,
जब तुम उसे कहती रहीं।
छायावाद के चार स्तंभों में,
तुम दीपशिखा बन प्रखर रहीं,
प्रकृति के हर रूप में तुम
अपनी छवि ही गढ़ती रहीं।
“गुलालों से रवि का पथ लीप,
जला पश्चिम में पहला दीप”—
ऐसी कल्पना की सुषमा से
आलोकित हर एक अतीत।
प्रकृति का मानवीकरण कर,
शब्दों में संगीत भरा,
“मधुर-मधुर मेरे दीपक जल”—
हर अक्षर में जीवन धरा।
तन्मयता, सौंदर्य, चेतना,
विज्ञता का अनुपम विस्तार,
सत्य की तुम साधिका थीं,
आत्मा का उज्ज्वल आकार।
करुणा की स्वर-सरिता बनकर
हिंदी में बहती रहीं,
नारी मन की पीड़ा को तुम
अमर स्वर देती रहीं।
संघर्षों की उस गाथा को
अक्षर-अक्षर अमिट किया,
मूक वेदनाओं के भीतर
जीवन का संगीत दिया।
“नीर भरी दुःख की बदली” जब
जग के आँगन छाई है,
तुम्हारी लेखनी ने फिर
आशा की ज्योति जगाई है।
संवेदना की कोमल छाया
हर पंक्ति में स्पंदित है,
तुमसे ही साहित्य सजा है,
तुमसे ही यह चिर वंदित है।
जन्मदिवस के पावन क्षण पर
श्रद्धा सुमन अर्पित बारंबार,
तुम्हारी वाणी अमर रहे
युग-युग तक हो साकार।
हे हिंदी की गौरव गाथा,
स्वीकारो यह विनम्र प्रणाम—
नारी चेतना की ज्योति बन
अमर रहे तुम्हारा नाम।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार











