Uncategorized
Trending

महादेवी वर्मा : पाठ्यपुस्तक के पन्नों से जीवन की स्मृतियों तक

कुछ लेखक ऐसे होते हैं, जिनसे हमारा परिचय किसी साहित्यिक गोष्ठी या पुस्तकालय में नहीं, बल्कि स्कूल की पाठ्यपुस्तक के उन मासूम पन्नों से होता है। उस उम्र में हम उन्हें केवल ‘पाठ’ समझकर पढ़ते हैं, परीक्षा में उत्तर लिखते हैं और फिर अगली कक्षा में बढ़ जाते हैं। लेकिन वर्षों बाद जब वही नाम स्मृति में लौटता है, तो एहसास होता है कि वे पाठ केवल पाठ नहीं थे—वे हमारे व्यक्तित्व की नींव में कहीं चुपचाप उतर रहे थे।

महादेवी वर्मा जी मेरे लिए ऐसी ही एक साहित्यिक स्मृति हैं।

कक्षा 9वीं–10वीं की हिंदी की किताब खोलते ही आज भी मन अनायास उसी बचपन की ओर लौट जाता है। उस समय रचनाओं के सारे नाम, क्रम और पाठ शायद उतनी स्पष्टता से याद नहीं थे, जितनी आज हैं; लेकिन उन पाठों से जुड़ी अनुभूतियाँ आज भी मन में उतनी ही ताज़ा हैं।

पढ़ाई के वे दिन भी कितने सुंदर थे—पाठ पढ़ते-पढ़ते कब परीक्षा आ जाती, पता ही नहीं चलता था। फिर परिणाम आता और दस-पॉइंटर बनकर कॉपी हाथ में आने की खुशी… वह बचपन भी कितना निश्छल था! 😊

हमारे लिए हिंदी की किताब केवल एक विषय की किताब नहीं थी। उसमें एक पूरा संसार बसता था—कविता का, कहानी का, संवेदना का, विचार का और कल्पना का।

मेरी शुरुआती साहित्यिक प्रेरणाओं में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि, कबीर, तुलसीदास, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जैसे रचनाकारों के साथ महादेवी वर्मा भी एक विशेष स्थान रखती हैं।

वाल्मीकि ने कथा की विराटता से परिचित कराया,
कबीर ने सत्य की निर्भीकता सिखाई,
तुलसी ने लोक और भक्ति की गहराई दिखाई,
जयशंकर प्रसाद ने सौंदर्य और दर्शन से जोड़ा,
प्रेमचंद ने जीवन का यथार्थ दिखाया,
निराला ने स्वतंत्र चेतना का स्वर दिया,
दिनकर ने शब्दों में ओज भरा,
और महादेवी वर्मा ने संवेदना को भाषा दी।

महादेवी जी की रचनाओं में मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती थी उनकी वह दृष्टि, जिसमें मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति और मूक जीव-जगत भी अपने पूरे अस्तित्व के साथ दिखाई देता है।

‘गिल्लू’ को याद करते ही बचपन की हिंदी की किताब का एक कोना जैसे फिर से जीवित हो उठता है। एक छोटी-सी गिलहरी के माध्यम से महादेवी जी ने जिस आत्मीयता, करुणा और जीव-जगत के प्रति संवेदना को व्यक्त किया, वह शायद उस उम्र में पूरी तरह समझ नहीं आई थी। मगर आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है—वह कहानी हमें चुपचाप मनुष्य होना सिखा रही थी।

संवेदना का आकार कभी पात्र के आकार से तय नहीं होता।

महादेवी वर्मा की कविताओं का संसार भी अपने भीतर एक अलग ही भावभूमि रखता है। ‘मधुर-मधुर मेरे दीपक जल’ जैसी कविता की स्मृति आज भी हिंदी की पाठशाला और उस उम्र की साहित्यिक दुनिया से जुड़ी हुई महसूस होती है। पाठ्यक्रम समय के साथ बदलते रहे, लेकिन कुछ पंक्तियाँ और कुछ भाव मन की किताब से कभी बाहर नहीं होते।

शायद साहित्य की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह हमें केवल पढ़ना नहीं सिखाता, महसूस करना सिखाता है।

तब कहाँ पता था कि हम केवल पाठ नहीं पढ़ रहे हैं—हम अपने भीतर एक साहित्यिक संसार तैयार कर रहे थे।

आज जब मैं स्वयं लेखन और साहित्य से जुड़ी हूँ, तो पीछे मुड़कर देखती हूँ और समझती हूँ कि मेरी साहित्यिक यात्रा की कुछ पहली सीढ़ियाँ उन्हीं पाठ्यपुस्तकों में थीं। उस समय शब्दों का अर्थ परीक्षा तक सीमित था, आज वही शब्द जीवन के अर्थ खोलते हैं।

कभी हम साहित्य को पढ़ते हैं, कभी साहित्य हमें पढ़ता है।

आज सारे पाठों के नाम भले हूबहू याद न हों, उनकी पंक्तियाँ भी शायद पूरी तरह स्मृति में न बची हों; लेकिन उन दिनों की सारी अनुभूतियाँ अब भी मेरे भीतर जीवित हैं। यही तो साहित्य की असली शक्ति है—वह स्मृति में शब्द बनकर नहीं, संवेदना बनकर रहता है।

पाठ भूल जाएँ, पर उसकी संवेदना न भूलें।
शब्द धुंधले पड़ जाएँ, पर उनका स्पर्श बना रहे।

एक समय था जब हिंदी की किताब से दस-पॉइंटर बनने की खुशी मिलती थी; आज वही किताब याद आती है तो लगता है—उसने तो उससे कहीं बड़ा उपहार दिया था, साहित्य को महसूस करने की दृष्टि।

और उस दृष्टि की पहली पाठशाला में
महादेवी वर्मा जी भी थीं।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उस महान साहित्य-साधिका को विनम्र श्रद्धांजलि।

महादेवी जी, आपकी लेखनी ने हिंदी साहित्य को केवल शब्द नहीं दिए—उसमें करुणा, सौंदर्य और संवेदना की एक ऐसी धारा प्रवाहित की, जो पीढ़ियों तक मनुष्य को भीतर से मनुष्य बनाती रहेगी।

— श्री ठाकुर
कवयित्री | रचनाकार | समीक्षक | मल्टी-आर्टिस्ट
देवघर, (झारखंड)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *