
विधा – गज़ल
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की
हसरत ही रह गयी दिल की बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की
अरमाँ थे तुम्हे अपना बनाने की
दिल का दर्द तुम्हे जताने की
अपने जज़्बातों को तुम्हारे एक साथ की
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की
तुम एक स्वप्न बन गयी
ना मिलनेवाली एक कीमती रत्न बन गयी
वक़्त था इन्तीहाई दर्द की वो रात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की
बर्बाद मोहब्बत की शम्मा आज भी दिल मे जलती है
तड़फ तुम्हे पाने की रह रह मचलती है
इश्क की इस आह मे मैयत निकलती मेरे तुम्हारे हालात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की
कदम दर कदम ही जुदाई का साथ है
तुम्हे खोने का नाकाबिले बर्दास्त अहसास है
मुकम्मल ना हुई जिन्दगी तेरी बेवफाई की खयालात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाकात की
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











