
चाँद जैसी रोटी चाहिए मुझे,गोल जैसी
साफ सुथरा एकदम धवल बर्फ जैसी
जैसे चांद दिखता है,नीलगाय मे
रोटी चाहिए मुझे ,बिल्कूल वैसी ही वैसी ।
हाँ, कभी कभार थोड़ी बूंद सी दाग भी हो
आधी हो, आधी से कम भी रोटी हो
चले जायेगा वो रोटी भी मुझे
लेकिन चांद जैसी रोटी , जरूर से जरूर हो ।
बोली पत्नी, चुन्नू कवि की बाते सुनकर
तो ठीक है,चांद जैसी रोटी ही दूंगी
लेकिन बाद मे कुछ कह ना पाओगे
क्योकि चांद तो ठंडी है न, याद कर ?
गर्म रोटी नही ब्लकि ठंडी रोटी मिलेगी
वो भी तेरे मुताबिक चांद जैसी रोटी होगी
खा लेना चुपचाप,फिर ना मुझे कुछ कहना
कि, ये ठंडी रोटी कैसे खाऊगी ??
चालाकी देख पत्नी का मन मेरा हर्षाया
बातो को फेरबदल,प्यार से समझाया
बना दो रोटी,जैसे तेरी मर्जी
भले रोटी चांद से नही,लेकिन पत्नी अच्छा है पाया ।
बाते समझती भी खूब है,और समझाती है
दिल मे रखी बाते साफ साफ कह देती है
मन के भावो को समझकर मेरा वो
प्यार से चांद जैसी रोटी,गरम ही बनाती है ।
चुन्नं साहा पाकुड़ झारखण्ड











