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कविता

जीवन उपयोगी बनी, भाषा है अनमोल।
पावन कालिन्दी सरिस, मधुरिम इसके बोल।
स्वर्णिम प्रत्यूषा लिए, समरसता का भाव,
दीप्तिमान सारा जगत, हिय पट रखती खोल।।

सर्वाधिक प्रचलित हुई हिंदी पूरे देश।
एक सूत्र में जोड़ती, सुंदर है परिवेश।
अलंकार रस छंद से, रहती है परिपूर्ण,
बने राष्ट्रभाषा जभी,कटे तभी है क्लेश।।

सुता हिमालय की रहीं, सौम्य शील गुणवान।
व्रत करती हरतालिका, पाने को वरदान।
घोर तपस्या देखकर, होते शंभु प्रसन्न,
पूर्ण कामना कर उमा,दिए संग पहचान।।

निर्जल व्रत हरितालिका, अर्चन भोलेनाथ।
कर सोलह श्रृंगार है,हिना रचाती हाथ।
पावन अतिशय श्रेष्ठ है,तीजा का यह पर्व ,
माँ गौरी के ध्यान से,मिले शंभु का साथ।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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