
बिना व्यापार किये कुछ भी नहीं,
शिक्षा व स्कूल ज्ञान के लिए नहीं,
चिकित्सा व डाक्टर रोगी के नहीं,
अब नेता-मंत्री जनता के लिये नहीं।
बदली सूरत इधर जमाने की है,
बुद्धिमान ईश्वर की दया चाहते हैं,
मूर्ख स्वयं को ही ईश्वर मानते हैं,
कुछ तो स्वयंभू ईश्वर बन बैठे हैं।
सबका भूत, भविष्य वह बताते हैं,
भविष्यवक्ता ख़ुद ही ख़ुदाया हैं,
आश्चर्य की पराकाष्ठा यह है कि
वह इस सबमें ही व्यापार करते हैं।
सामाजिक क्रन्दन न दिखे उनको,
प्रकृति का क्षरण न दिखे उनको,
कंकरीट के महलों में रहने वाले,
जल जंगल सब व्यर्थ लगें उनको।
दया प्रेम का भाव नहीं है इनमें,
बस धन दौलत की चाहत सबमें,
आदित्य इंसान की इंसानियत,
खो चुकी है आज हैवानियत में।
डॉ. कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ











