
आओ गणपति मेरे साथ।
सकल सुमंगल कार्य पूर्ण हों, जो तुम्हें नवाये माथ।।
आओ गणपति मेरे साथ-2
1- विघ्नहरण गौरीसुत संकर,
सुवन, विराजे संग कैलास।
देवन विनती की, हर लीन्हें,
उनके कष्ट दिया सुख-साज।।
तेरी महिमा कोई न जाने, हे गणपति गणनाथ।
सकल सुमंगल कार्य पूर्ण हों, जो तुम्हें नवाये माथ।।
आओ गणपति मेरे साथ-2
2- रिद्धि-सिद्धि के दाता हो तुम,
करते शुभ, देते हो लाभ।
करते शान्त विरोध, कलह सब,
हो आनन्द सदा रक्ताभ।।
दीनबन्धु हरिये तन पीड़ा, मन व्याकुल हूँ अनाथ।
सकल सुमंगल कार्य पूर्ण हों, जो तुम्हें नवाये माथ।।
आओ गणपति मेरे साथ-2
3- कवन काज जग में है भारी,
कवन मार्ग दुष्कर असुरारि।
प्रेममूर्ति सुनते हो सबकी,
बुद्धि, विनायक महिमा न्यारि।।
आओ टेर लगायें हैं सब, तुम्हरी करो सनाथ।
सकल सुमंगल कार्य पूर्ण हों, जो तुम्हें नवाये माथ।।
आओ गणपति मेरे साथ-2
रचनाकार-
जुगल किशोर त्रिपाठी (साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)











