
शंकर सुवन हे सिद्धिविनायक,
गणपति गज-मुख मंगल दायक,
कटुता क्लेश मिटाकर मनसे,
मेरे विघ्न हरो ।
हे गणपति ! स्थिर चित्त करो ।।1।।
काम वासना जगे न मन में
करूँ अर्चना प्रति-पल क्षण में,
लोभ मोह मत्सर से स्वामी,
मुझको मुक्त करो।
हे गणपति! स्थिर चित्त करो।।2।।
पार्वती सुत विघ्न विनाशक,
निर्बल जन के भाग्य विधायक,
सुख संपत्ति शौर्य के स्वामी,
सब संताप हरो ।
हे गणपति ! स्थिर चित्त करो।।3।।
प्रथम पूज्य हो जग में गणपति,
भरते स्नेह दूर कर दुर्गति,
‘जिज्ञासु’ जन-मन अभिलाषा,
सबका पूर्ण करो।
हे गणपति! स्थिर चित्त करो।।4।।
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













