श्री गणेश की पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि वास्तव में यह जीवन की समृद्धि, शांति, वैभव और समाज के एकीकृत के लिए आवश्यकता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विघ्नहर्ता श्री गणेश का अवतरण भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। भगवान गणेश प्रथम पूज्य देव है, जो सभी विघ्नों को हरने वाले और ज्ञान के देवता माने जाते हैं। भारतीय संस्कृति में देवताओं की प्रतिमाएँ केवल पूजा का साधन मात्र नहीं हैं, बल्कि वे गहन जीवन-दर्शन और प्रेरणा की प्रतिमूर्ति होती हैं। गणपति का स्वरूप देखने में जितना सरल, उतना ही गूढ़ और शिक्षाप्रद है। यदि हम उनकी मूर्ति के प्रत्येक अंग को ध्यान से देखें, तो जीवन जीने की कला का अद्भुत संदेश मिलता है। गणेश जी के बड़े कान हमें सिखाते हैं कि जीवन में सुनना बोलने से अधिक महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति धैर्यपूर्वक दूसरों को सुनता है, वही सच्चा ज्ञान अर्जित करता है और समाज में सम्मान पाता है। उनके छोटे नेत्र यह संदेश देते हैं कि दृष्टि गहरी होनी चाहिए।
उनकी लंबी सूंड लचीलेपन और अनुकूलन का प्रतीक है। मनुष्य को भी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए।
भगवान दास शर्मा ‘प्रशांत’ इटावा उत्तर प्रदेश













