
हिंदी दिवस पर
हिंदी मरणासन्न हुई है
क्यों हिंदी में गीत लिखे ?
अंग्रेजियत चढ़ी है सिर पर।
क्यों उसको मनमीत लिखे।।
श्राद्ध पक्ष जैसा आता है।
एक दिवस हिंदी की बात।।
वर्ष पर्यंत यह दंश झेलती।
करते हैं अपने आघात।।
अंग्रेजी के ये विद्यालय।
हिंदी को कैसे प्रीत लिखें।।
हिंदी मरणासन्न हुई है।
क्यों हिंदी में गीत लिखे?
न्यायालय में भी अंग्रेजी है,
हिंदी का कोई नाम नहीं।।
अंग्रेजियत बढ़ाई इतनी।
हिंदी का कोई काम नहीं।।
पल-पल पग पग हुई पराजित।
कैसे इसको जीत लिखे।।
हिंदी मरणासन्न हुई है।
क्यों हिंदी में गीत लिखे।।
मां हो गई है अब तो मम्मी।
पिता हो गए हैं अब डैड।।
सूख गए हैं, टूट गए हैं।
थे कभी जो विशाल पेड़।।
चरण वंदना पर भाषा की।
इसको कैसी रीत लिखें।।
हिंदी मरणासन्न हुई है।
क्यों हिंदी में गीत लिखे।।
हिंदी में है तुलसी सूर।
हिंदी ही भक्ति का नूर।।
हिंदी आपस में जोड़े।
हिंदी में नव रस भरपूर।।
हिंदी अपनी शान है।
हिंदी गर्व गुमान है।।
हिंदी में मधुरिम संगीत।
हिंदी संस्कृति की जान है।।
सोनी बरनवाल “कशिश”
जमुई, बिहार













