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लफ़्ज़ों की अदालत

सुनो! मेरी इन चलती साँसों में तेरा रहना ज़रूरी है,
अनकही नासमझ बातों को अब समझाना ज़रूरी है।

​जहाँ कल तक बहते थे केवल प्रेम के निर्मल सोते,
वहाँ से अब बबूल के तीखे कांटों को हटाना ज़रूरी है।

​लफ़्ज़ों की इस अदालत में गवाहियाँ तो बहुत होंगी,
मगर ख़ामोश आँखों के अश्कों को पढ़ना ज़रूरी है।

​रिश्तों की नाज़ुक डोर उलझ जाती है अक्सर ही,
गाँठें खोलने की ख़ातिर थोड़ा झुक जाना ज़रूरी है।

​अंधेरों की क्या मजाल जो अपने घर में घर कर लें,
उम्मीद का इक दीया चौखट पे जलाना ज़रूरी है।

​वक़्त की धूल जम न जाए सुनहरी यादों पर,
पुरानी तस्वीरों से कभी धूल को हटाना ज़रूरी है।

​ग़लत फ़हमियों के साये अक्सर रिश्तों को डसते हैं,
भरोसे की धूप में ज़रा उन्हें सुखाना ज़रूरी है।

​कलम से लिख रही हूँ आज अपने दिल की हर धड़कन,
जो तुम तक पहुँचे ‘रजनी’, तो बताना ज़रूरी है।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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