
भाड़े पर मिली है ज़िंदगी,
इसे अपनी समझने की भूल न करना,
आज हँसी है होंठों पर,
कल आँसू हों तो कोई गिला न करना।
नन्ही-सी मुस्कान में देखो,
जीवन का सच्चा सार छिपा है,
जिसे हम उम्र भर ढूँढ़ते रहे,
वह सुकून तो इस पल में मिला है।
न दौलत इसकी, न शोहरत अपनी,
न साँसों पर अपना अधिकार है,
कुछ पल के लिए मिली है दुनिया,
फिर लौट जाना ही संसार है।
मालिक बनने की चाह छोड़कर,
बस इसके मुसाफ़िर बन जाना,
जो मिला है उसे प्रेम से जीना,
जो छूट गया—उसे मुस्कुराकर भुलाना।
ज़िंदगी किराए का घर है,
सामान समेटते रहना होगा,
जब तक साँसों की चाबी है हाथों में,
तब तक खुलकर जीना होगा।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र











