
विधा – काव्य
दुनियाँ में पाप पुण्य की क्या गवाही हो
गर जब जग उद्धारक प्रभु श्री कृष्ण की भी ना सुनवाई हो
जग कल्याण के निमित्त इस जग ने ही प्रभु को दिया था श्राप
पाप की इस दुनियाँ में जीवन उनका भी बन गया था संताप
जग में आयें हो तो तपना ही पड़ेगा
इस भट्टी में जल जलकर ही जीना पड़ेगा
भवसागर है पार करना नही है आसाँ
डूबना उतरना फिर डूब जाना ही संपूर्ण है जहाँ
कर्म क्षेत्र रण क्षेत्र भाग्य क्षेत्र का ये एक मैदान है
जीतना हारना हारकर जीना ही मूलमंत्र ज्ञान है
ज्ञानी सब है ज्ञान किसी के पास नहीं है
सिखाना सबको आता है सीखने का अरमान नहीं है
छदम सुख की लालसा ने ही इंसान को हैवान बना दिया
स्वर्ग से प्यारी इस धरा को जीवित मुर्दों का शमशान बना दिया
हृदय तो मनुष्य में है हृदयहीन हो गया
भावनाओं की दुनियाँ में भावनाओं का ही अंत हो गया
पैसा दुनियाँ का भगवान हो गया भगवान जाने कहाँ रह गया
मुर्दों की बस्ती ये दुनियाँ हो गई इंसान जाने कहाँ खो गया
जीवन वो इम्तिहान है देना ही पड़ेगा गर जीवन में आया है
मनुष्य क्या खुदा भी कहाँ इस समर से बच पाया है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











