
शहर में आया एक लड़का
छोटे से घर का एक लड़का,
आँखों में बड़े सपने लेकर आया था,
माँ की दुआएँ पोटली में बाँधकर,
पिता का विश्वास हृदय में सजाया था।
जेब में थोड़े से पैसे थे,
पर हौसलों की कमी नहीं थी,
शहर की ऊँची इमारतों के आगे,
उसकी उम्मीद कभी झुकी नहीं थी।
गाँव की पगडंडी छोड़कर जब,
शहर की सड़कों पर कदम बढ़ाया,
हर चेहरा अनजान मिला,
फिर भी उसने खुद को संभाला।
कभी कमरा छोटा था,
कभी रातें बहुत लंबी थीं,
कभी मेहनत के बदले थकान मिली,
कभी आँखों में नमी थी।
माँ फोन पर बस इतना कहती—
“बेटा, अपना ख्याल रखना,”
पिता चुपचाप कहते—
“हार मत मानना, आगे बढ़ते रहना।”
वह लड़का जानता था,
मध्यवर्गीय घरों के सपने आसान नहीं होते,
इन सपनों के पीछे अक्सर
कई त्याग और अरमान होते।
दिन में काम, रात में पढ़ाई,
वक्त से उसकी जंग चलती रही,
कभी किस्मत रूठी तो क्या,
उसकी मेहनत साथ चलती रही।
धीरे-धीरे शहर ने भी
उसकी पहचान स्वीकार कर ली,
जिस राह पर काँटे मिले थे,
उसी राह ने मंज़िल सँवार दी।
एक दिन जब पहली कमाई से
उसने घर का सामान खरीदा,
माँ की आँखों में खुशी थी,
पिता ने गर्व से माथा चूमा।
वह जीत सिर्फ उसकी नहीं थी,
उस पूरे परिवार की जीत थी,
जिसने छोटे से घर में रहकर
बड़े सपनों की नींव रखी थी।
आज भी वह लड़का कहता है—
“शहर बड़ा हो या रास्ता कठिन,
अगर इरादे सच्चे हों दिल में,
तो मंज़िल मिलती है एक दिन।”
मध्यवर्गीय घर का वह बेटा
अब भी सपने देखता है,
क्योंकि जिसने संघर्ष को अपना साथी बनाया हो,
वही सच में आगे बढ़ना सीखता है।
नाम – राजनीता प्रसाद











