
वसन सुसज्जित रतन विभूषित
मत्त घमंड में चूरिया।
कहते उसको लंगा लंगटा
हम भाषी भोजपुरिया।।
बिना वसन के बहुतेरे हैं
मस्तमगन इतराते।
गांधी के सपनों का भारत
तार- तार करवाते।।
विरोध करे गलती का उसको
आंच चढ़ाते हैं।
जन गण हेतु त्यागी को
बहु शूल धंसाते हैं।
है कहां शांत गगरी।
अशांत गांव नगरी।।
शासन से क्या आंख मिलाये
भोली भाली जनता।
नेताजन इसके अधिकारी
जो शासन सुखहंता।।
रामराज केवल उनका सुराज
मनाते हैं।
जन गण हेतु त्यागी को बहु
शूल धंसाते हैं।।
है कहां शांत गगरी।
अशांत गांव नगरी।।
गांधीवादी होने का करते
ढोंग चढ़े परवान।
पनछुछुरा रंगों में रंगे
गांधी ठामे ठाम।।
क्या समझें वे दर्द पराया
जग भरमाते हैं।
जिंदा गांधी हृदय समेटे
लाश रमाते हैं।।
है कहां शांत गगरी।
अशांत गांव नगरी।।
सत्य छिपा अस्ताचल में
क्या उनका हो विश्वास।
कमजोरों को और करें
कमजोर जीर्ण संकास।।
अत्याचार करन को अपनी
शान जनाते हैं।
घोर अन्हरिया सात पुश्त के
विभव बनाते हैं।
है कहां शांत गगरी।
अशांत गांव नगरी।।
दौड़ो धीम करो औरों को
जिनके नियम हैं खास।
दो कौड़ी के लाभ की खातिर
हरते जन उच्छवास।।
पग पग घुटन के मंजर ढाना
विधि बनाते हैं।
चुपुर चुपुर आवाज में लुपुर
मिजाज बनाते हैं।।
है कहां शांत गगरी।
अशांत गांव नगरी।।
साहस के हैं अतुल निराले
लूट खसोटन चूर।
इनका जीवन दर्शन धीरज
दनुज कर्म भरपूर।।
माफी रंजन जी से मांगत
हम अकुलाते हैं।
गांधी के सपनों का भारत
कहां सजाते हैं।।
है कहां शांत गगरी।
अशांत गांव नगरी।।













