
उन दिनों जितिया पर्व आते ही फुआ (बुआ) का घर गुलज़ार हो जाता था। पूरा गोतिया (कुनबा) वहाँ इकट्ठा होता। जितिया के दिन बनने वाले पारंपरिक ‘झोड़-भाथ’ (कुसीकेराव -चावल) का स्वाद चखने के लिए लोगों का आना-जाना लगा रहता था। हँसी-मज़ाक के बीच एक प्रार्थना हर किसी के दिल में होती थी। घर के बुज़ुर्ग और सभी गोतिया लोग जिमुतवाहन देवता से यही मिन्नत करते, “हे जिमुतभान बाबा! हमारे घर-आँगन में भी यह पावन पर्व चालू करवा दीजिए, अपनी कृपा कर दीजिए।”
फिर वो मंगल दिन आ ही गया। जिमुतवाहन देवता ने परिवार की पुकार सुन ली और घर में आशीर्वाद बनकर मेरी छोटी बहन ‘पूजा’ का आगमन हुआ। पूजा के जन्म लेते ही घर की मन्नत पूरी हुई और आगे चलकर पूरे गोतिया में जितिया का पर्व धूमधाम से शुरू हो गया। वह सचमुच हमारे घर की लक्ष्मी थी।
बचपन की वह शामें आज भी आँखों के सामने तैर जाती हैं, जब पूजा का जन्मदिन आता था। उन दिनों आज की तरह फैंसी बेकरी वाले केक नहीं होते थे। माँ बड़े प्यार से सूजी का हलवा बनातीं और उसे चमचमाती थाली में सुंदर आकार देकर सजा देती थीं। वही हलवा हमारे लिए दुनिया का सबसे स्वादिष्ट ‘केक’ बन जाता, जिसे पूजा बड़े चाव से काटती और पूरा परिवार खुशियाँ मनाता।
वक्त का पहिया घूमा और हमारी छोटी सी पूजा आज खुद एक माँ बन चुकी है। परंपरा और ममता का यह सिलसिला आज भी थमा नहीं है। आज मेरी छोटी बहन पूजा अपनी खुद की बेटी की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए उसी निष्ठा से जितिया का निर्जला व्रत करती है, जैसे अभी भी माँ हम सब भाई-बहनों के लिए किया करती हैं।
मेरी प्यारी छोटी बहन पूजा, तुम्हें जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएँ! जिमुतवाहन देवता का आशीष तुम पर और तुम्हारी बिटिया पर सदा बरसता रहे।
कवयित्री ज्योति बरनवाल,
नवादा (बिहार)













