
कुछ लिखने का बड़ा मन है,
मगर क्या लिखूँ…
टूटे हुए सपने लिखूँ,
या
बिखरे हुए ख्वाब लिखूँ,
जो अपने होकर भी अपने न रहे,
या
उन रिश्तों का हिसाब लिखूँ,
या
फिर उन खामोश रातों को,
जिनमें खुद से ही की गई बातचीत लिखूँ…
जो दर्द किसी को बता न सका,
वो दर्द लिखूँ..
या
चेहरे पर रखी उस मुस्कान का,
जिसके पीछे छुपी पूरी बरसात लिखूँ…
उन रिश्तों के दिये ज़ख्मों का हिसाब,
या
जख्मों के दर्द को सहने का प्रयास लिखूँ…
अपनी सादगीपूर्ण जिंदगी में मिले धोखे,
या
लोगों के एक चेहरे के पीछे छिपे नक़ाब की असलियत लिखूँ….
के वी












