
कुछ व्यक्तित्व समय के साथ इतिहास नहीं बनते,
वे स्वयं इतिहास की दिशा बदल देते हैं।
गांधी उन्हीं विरल व्यक्तित्वों में से एक हैं—जिनका ‘तब’ संघर्ष है, ‘आज’ आत्ममंथन है और ‘कल’ एक उम्मीद।
तब, जब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था, एक साधारण-सा दिखने वाला व्यक्ति हाथ में लाठी लिए करोड़ों लोगों के भीतर साहस जगा रहा था। न सत्ता का बल, न हथियारों का सहारा—साथ था तो सत्य, अहिंसा और अडिग आत्मबल।
चंपारण से खेड़ा, असहयोग से दांडी मार्च और फिर भारत छोड़ो आंदोलन तक, गांधी ने स्वतंत्रता के संघर्ष को जन-जन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सत्याग्रह, स्वदेशी, स्वावलंबन और अहिंसा को संघर्ष की प्रभावी धार बनाया।
13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद गांधी ने ब्रिटिश शासन के प्रति अपने रुख को और कठोर किया और बाद में सरकार से मिले सम्मान लौटाने का निर्णय लिया। 2 अगस्त 1920 को उन्होंने अपने सम्मान वापस कर दिए।
यहीं गांधी के व्यक्तित्व का एक और रूप सामने आता है—स्वाभिमान।
किसी ने उन्हें कभी “अर्धनग्न फकीर” कहा था। शायद उनके वस्त्रों की सादगी दिखाई दी, लेकिन उस सादगी के भीतर छिपा आत्मबल नहीं। जिस व्यक्ति के पास वैभव नहीं था, उसके पास अपना स्वाभिमान, अपना विश्वास और अपना जमीर था।
जिस सम्मान को पाने के लिए मनुष्य कभी-कभी अपने सिद्धांतों से समझौता कर बैठता है, गांधी ने अन्याय के विरोध में उसी सम्मान को त्यागना स्वीकार किया। उनके लिए उपाधि से बड़ा था सिद्धांत, प्रतिष्ठा से बड़ा था आत्मसम्मान और बाहरी सम्मान से बड़ा था अंतरात्मा का सत्य।
आज, जब हमारे पास साधन बहुत हैं, तकनीक बहुत है और दुनिया पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई है, तब भी मनुष्य के भीतर की शांति और संवेदना के प्रश्न बने हुए हैं।
हमने दुनिया को कितना बदला—यह तो दिखाई देता है,
लेकिन हमने स्वयं को कितना बदला—यह प्रश्न भीतर उतरता है।
मेरे लिए गांधी केवल स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता नहीं, बल्कि एक ऐसा विचार हैं जो हमें अपने आचरण का आईना दिखाता है। वे याद दिलाते हैं कि अधिकार के साथ कर्तव्य भी है, स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी और संघर्ष के साथ मनुष्यता भी।
कल, आने वाली पीढ़ियाँ गांधी को केवल चश्मे, लाठी और चरखे की तस्वीर में न खोजें। वे उन्हें उस साहस में खोजें, जो अन्याय के सामने झुकता नहीं; उस स्वाभिमान में खोजें, जो सिद्धांतों की कीमत पर मिली प्रतिष्ठा को स्वीकार नहीं करता; और उस मनुष्यता में खोजें, जो संघर्ष में भी करुणा को जीवित रखती है।
गांधी तब भी आवश्यक थे, जब देश को आज़ादी चाहिए थी;
गांधी आज भी आवश्यक हैं, जब हमें अपने भीतर झाँकने की जरूरत है;
और गांधी कल भी प्रासंगिक रहेंगे, जब मनुष्य को विकास के साथ अपना जमीर बचाए रखने की जरूरत होगी।
इसलिए गांधी जयंती केवल पुष्प अर्पित करने का दिन नहीं,
अपने भीतर के सत्य से मिलने का दिन भी है।
क्योंकि अंततः गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं—
एक प्रश्न हैं, जो हर पीढ़ी से पूछते हैं—
जब सत्य और स्वार्थ आमने-सामने हों,
तो तुम किसके साथ खड़े होगे?
लेखिका एवं मल्टी-आर्टिस्ट
श्री ठाकुर
देवघर, (झारखंड)













