
धीरे-धीरे जिंदगी ने इतना सिखा दिया,
कि अब किसी चीज़ की चाह नहीं रही…!
कोई साथ रहे तो भी ठीक,
कोई छोड़ जाए तो भी ठीक…!
अब न किसी से शिकायत है,
न किसी से कोई उम्मीद बाकी है…!
अपनी तकलीफें अब खुद तक ही रखता हूँ,
क्योंकि हर कोई समझे, ज़रूरी नहीं होता…!
लोग बदलते रहे, वक़्त गुजरता रहा,
और हम ख़ामोशी से संभलते रहे…!
अब तन्हाई ही अपना सुकून है,
भीड़ में भी दिल अकेला ही रहता है…!
दुनियादारी से थोड़ा दूर हो गया हूँ,
अब ख़ुद के साथ रहना अच्छा लगता है…!
अब शोर से नहीं, सुकून से मोहब्बत है,
मतलबी रिश्तों से दूर, खुद से ही निस्बत है…!
जो मिला उसमें खुश हूँ, जो नहीं मिला उसका गम नहीं,
अब जिंदगी जैसी भी है, उसी में हम हैं…!
सच कहूँ तो अब थक गया हूँ समझाते-समझाते,
इसलिए अब बस चुप रहना सीख गया हूँ…!
के वी












