
दिल के जज़्बात कहें—तो बात ज़रा गहरी है,
ये ज़िंदगी नहीं साहब… एक चलती हुई पहेली है।
कभी धूप मिली राहों में, कभी छाँव का सहारा,
कभी अपनों ने हाथ थामा, कभी मिला जग सारा।
जो मिला—उसे मुस्काकर, दिल से अपना लेना,
जो छूट गया—उसकी खातिर, खुद को नहीं खो देना।
ठोकर को भी गुरु मानो, गिरकर फिर उठ जाना,
अँधियारे के बीच हमेशा, उम्मीद का दीप जलाना।
रिश्तों की डोर सँभालो, इसमें ही धन सारा,
प्यार बाँट दो दुनिया में—यही जीवन का उजियारा।
धन-दौलत सब यहीं रहेगी, साथ न कुछ भी जाना,
कर्मों की खुशबू छोड़ सको—बस इतना कर जाना।
सच की राह कठिन होगी, फिर भी कदम बढ़ाना,
झूठ की भीड़ में रहकर, अपना सच न गँवाना।
जीवन की इस राह में, बस इतना याद रखना,
मिल जाए जो प्रेम, उसे दिल से आबाद रखना।
न नाम रहेगा, न धन, न ये संसार रहेगा,
बस तुम्हारे कर्मों का ही उजला संसार रहेगा।
जब आख़िरी साँस हो और जीवन की शाम ढले,
तो दिल ये न कहे—“काश, कुछ और पल मिले…”
बस इतना हो कि दुनिया मुस्कुराकर ये कहे—
“वो इंसान नहीं, एक एहसास था…
जो खुद चला गया, मगर प्रेम छोड़ गया।”
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार












