
आँखों में आँसू लिए द्वार पर खड़ा हूँ,
जाते हुए इस जुदाई का बोझ लिए जा रहा हूँ।
तुम सब मोरनी सी थिरकती थीं मेरी धुन पर,
तुम शरद की चाँदनी जैसी सोलह कलाओं वाली थीं।
तुम्हारा रूप दूध में केसर जैसा खिला था,
पर आज मैं सुबह-सुबह तन्हा विरह लिए जा रहा हूँ।
मैंने जो भी रूप धरे, सिर्फ तुम्हारे लिए धरे,
राधे बताओ, क्या मैं कभी तुम्हारे बिना जी पाया हूँ?
ये अक्रूर की कठोरता है, ये किस्मत का लेखा है,
मैं दिल में दर्द का अंबार लिए जा रहा हूँ।
पता नहीं अब किस जन्म में फिर मिलना होगा,
वो पल भी याद नहीं जब आँखें बंद न हों।
आज मेरा मन यमुना सा बह रहा है, गोकुल बेचैन है,
मैं टूटी हुई नाव की पतवार लिए जा रहा हूँ।
……………………………..
राधा मन……..
कृष्ण, मेरा मन तो लौटा दो, तुम तो मेरा प्राण ही लिए जा रहे हो।
सिर्फ तुम थे, मैं थी और तुम्हारी वो पगली बाँसुरी थी,
फिर क्यों तुमने ही हमारे प्यार की वो नाजुक पंखुड़ी तोड़ दी?
हमारा प्यार आज धूल में पड़ा है, और तुम आँसुओं में भीगी ये जीत लिए जा रहे हो।
जब हमारा रास रचता था आठों दिशाओं में,
खुद योगमाया भी न समझ पाई कि तुम्हारा मन कहाँ अटका है।
सारे शुभ सपने टूट गए, तुम एक गहरा दर्द देकर जा रहे हो।
यमुना की धारा उदास है, कदंब का पेड़ भी मुरझाया है,
सारे ग्वाले आधे मरे से हैं, हर साँस में जलन है।
एक कमजोर की बाँह छुड़ाकर, तुम प्यार का भरोसा तोड़कर जा रहे हो।
कभी मैं तुम्हारे साथ आकाश में रथ पर बैठी थी,
आज दिल में एक नुकीली बर्छी सी चुभी रह गई है।
क्योंकि तुम उद्धव के लिए, प्रेम का पूरा घड़ा खाली करके जा रहे हो।
के वी













