
गुरु ज्ञान का दीप जलाकर,
अँधियारा हर लेते हैं,
जीवन की कठिन राहों में,
सच्चा पथ धर देते हैं।
अक्षर-अक्षर ज्ञान बाँटकर,
सपनों को आकार दें,
भटके मन को राह दिखाकर,
जीवन को संस्कार दें।
माटी जैसे बाल मनों को,
सुंदर रूप सँवारते,
मेहनत, साहस, सत्य की बातें,
हर पल हमें सिखाते।
स्वयं तपें चंदन बनकर,
खुशबू जग में भरते हैं,
शिष्य सफलता की ऊँचाई छूए,
तभी तो हँसते हैं।
गुरु केवल पढ़ाते नहीं,
जीवन जीना सिखलाते,
गिरने पर फिर उठना सिखा,
मंज़िल तक ले जाते।
माता-पिता के बाद गुरु का,
सबसे ऊँचा मान,
उनके चरणों में मिलता है,
ज्ञान-धर्म का ज्ञान।
विश्व शिक्षक दिवस पर हम,
नमन करें हर गुरु को,
जिनसे मानवता मिली हमें,
और उजियारा मिला जीवन को।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













