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कविता


घर के टूटते हुए दरवाजे से हवा आ रही है,

ठंडी हवा ने कहा कि चला जाएं यहां से,

कम्बल और नींद ने मुझे जाने ही नहीं दिया,

शुक्रिया करो उनको जिन्होंने तुम्हें घर तो दिया है सोने के लिए,

वरना किसी अनजान धर्मशाला में सिर्फ एक रात सोने के पैसे भी देते तुम ,

जिंदगी भर का ठैका जिसने लिया है तुम्हें सम्भाल कर रखने के लिए,

उसे घर कहते हैं,

यह अपना घर है,
अपनापन है अपने परिवार से जुड़े हुए,

अनजाने मुसाफिर कि तरहां सुबह सुबह जल्दी उठाकर बाहर निकाल दिए जाते,

कभी कभी हम हंसते हैं कि यह कोई घर है, यह चबूतरा है और ऐसा मोहल्ला है,,

सारी जिम्मेदारी से कुछ ऐसा ही करके दिखाओ तो जानोगे तुम,

कि एक उम्र गुजार दी जाती है,
यहां पर इसे बसाने के लिए,

सपनों का घर बनाने को चले थे कभी,
मगर फिर मुड़ कर देखा तो उम्र पिछे हि छुट गई,

जैसा भी है और जहां भी हो,
इसे ही स्वर्ग कहते हैं,,
बाकी सब दुनिया की ये चमक ये दमक चार दिनों की हे,

बहुत याद आती रहेगी,

मेरे बचपन की गलियां,

मेरे सपनों से भरे चौराहे,

मधुवन सी नन्ही परियां ,

गांव में बुजुर्ग भरे चौबारे।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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