
‘झूठ के पांव नहीं होते’–
अब झूठ के पांव…. कलिकाल में आते हैं उग
उगाने का हुनर आना चाहिए
गवाह मिल जाएंगे… झूठ को दौड़ा कर दिखाएंगे
ये सब देख-सुन तुम जाओगे उब।
आता है किसी-किसी को
ये हुनर
अब रात में दिन का अहसास
दिन को रात कहने वाले भी मिल जाएंं आस-पास।
वक्त अब बदला
सर्दी में हो जाए गर्मी का एहसास।
भाई मेरे ! क्यूं होते हो निराश
वो मानों…जहां बिन बुलाए गवाह
काले को सफेद कहने वाले
मुवक्किल को न होने दें वक्त पर हताश
बात को बाखूबी दें तराश।
बात हजम होनी चाहिए… मानों न मानों
वक्त का ये फेर
तुम्हारे असूल
अब दफन हो चुके
वो वहां दबे हैं जहां लगा है मिट्टी का ढेर
रात के अंधकार में कहलवा दें
ये रात नहीं हो चुकी है सवेर ।
झूठ के भी होते हैं पांव … चोतरफा खड़े हैं घेर।
- महेश शर्मा, करनाल










