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क्या आप भी रावण हो?

रावण को जलने वाले जरा,
इतना बताओं क्या? अपने ,
अंदर का रावण जलाया क्या?
क्या राम जैसा बनाया खुद को?

बताओं अपने मन का,
सुनाओ अपने तन का,
क्यों न जलाया स्वयं को,
लोगों से इतनी ईर्ष्या क्यों?

क्यों न जलाते अपनी आंखों को,
जो पराई स्त्रियों को घुरती है,
जो अंगों का अंगिन करता है,
जरा अपनी नजरों का रावण मारो।

क्यों किसी की खुशियों से मर रहे हो,
क्यों ये मुखौटों से बन रहें हो,
रावण जलाकर खुद को छिपा रहे हो,
क्यों खुद को धोखा दे रहे हो।

रावण को जलने वाले जरा,
अपनी इच्छाओं को जलाओ,
रावण मत बनों तुम,
अंतर्मन को पहचान लो।

लेखिका कवि-नीतू धाकड़ (अम्बर) नरसिंहगढ़ मध्यप्रदेश

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