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क्या तुम सच में इंसान थे?

एक ही अंबर, यहाँ एक ही धरती,
एक ही सूरज, यहाँ एक ही जीवन।
एक ही चंदा, यहाँ एक ही प्रकृति,
प्यास बुझाता जल ही—
फिर क्यों न जाती प्यास हर क्षण?

इंसानियत पर धर्म है भारी,
धर्म पर धर्म के ठेकेदार हावी।
ठेकेदार पर नेता भारी,
नेता पर सत्ता की सवारी।

सत्ता पर राजनीति भारी,
और इन सब पर भ्रष्टाचार सवारी।
सच की रोशनी छिपी है अँधेरों में,
इंसान भटकता है रिश्तों के पहरों में।

भूख भी कमाल है, शायद यही बवाल है,
खा जाती इंसान को—इंसानियत बेहाल है।

धन खाता है, धान खाता है, खा जाता घर-बार,
अच्छा-भला आदमी भी बन जाता हैं बेईमान।

अब वक़्त है जागने का,
नफ़रत के साए भगाने का।
इंसानियत को फिर सँवारो,
धरती को अपना घर मानो।

वरना आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
“क्या तुम सच में इंसान थे?”

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