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काव्यअल्हड़ सा प्रेम

अनगिनत सवालों के साथ वो नजरों का टकराना ,

अल्हड़ सा प्रेम था ,या था कोई अफसाना ।।

वो अल्हड़ सी बात, वो पहली सी मुलाक़ात,

नज़रों में कुछ था, पर लफ़्ज़ों में नहीं।

वो नज़रों का मिलना, अनकहे सवाल उभरे,

मन की गलियों में जैसे समय, ठहर के गुजरे।।

ग़ुस्सा भी आया पर ,
ग़ुस्से में छिपा मीठा सा यकीन।।

न रंज था न गुस्सा बस हल्की सी खनक,

भीतर पनप रहा ,जैसे अनजान सी ललक।

टकरार हुई तो ,जैसे बारिश छू गई,

हर लफ़्ज़ में इक, मुस्कान घुल गई।।

न जाने क्यों मन ,फिर मचलने लगा,

हर रंज में भी वो हँसने लगा।।

ये कैसा एहसास है — जो समझ ना आए,
दिल बात कहे, जुबाँ रुक जाए।।

मिलूं कभी तो कसकर गले लगाना ,
बस मेरी धडकनों को छूकर गुजर जाना।।

शायद यही प्रेम है,

जो धीमे-धीमे,मन में गुनगुनाए…


श्रीमती प्रतिभा दिनेश कर विकासखंड सरायपाली
जिला महासमुंद छत्तीसगढ़

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