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कान्हा गीत

मैं तो सारी उमरिया लुटाए बैठी लुटाए बैठी
गिरधारी मैं सुध बुध बिसराए बैठी
तेरे हाथों में बंशी, अधरों पे मुस्कान
शीश मोर मुकुट, सजाए बैठी सजाएं बैठी
गिरधारी मैं सुध बुध बिसराए बैठी …..

अंग पीताम्बर गले, मोतियन माल
तेरे घुंघराले और,काले काले बाल
देख कारे कारे बदरा बुलाए बैठी बुलाएं बैठी….
गिरधारी मैं सुध बुध बिसराए बैठी …

कारे मेघा जो आये, भंवरे गुनगुन गाये
कलियां मुस्कुराईं,पलकों पे सजाई
मैं तो राह में पुष्प बिछाएं बैठी बिछाएं बैठी
गिरधारी मैं सुध बुध बिसराए बैठी ….

कान्हा आये हमारी कुटिया में
खुशियां भर गई है लुटिया में
माखन मिश्री का भोग लगाएं बैठी लगाएं बैठी …
गिरधारी मैं सुध बुध बिसराए बैठी …
मैं तो सारी उमरिया लुटाए बैठी लुटाए बैठी……
स्वरचित : रजनी कुमारी

लखनऊ,उत्तर प्रदेश

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