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अनमोल रत्न


रोटी भवन और वसन
जीने हेतु है अनमोल रत्न
इन्हे सबो की है जरूरत
लेकिन जैसे जिसकी कूवत
रोटी भवन है मन की बात
वसन है हमारे तन की बात
सलीके से इसे करे धारण
नही तो विपदा का दोगे आमंत्रण
तन की बढाते है ये सूरत
वसन से निखरता है मूरत
वसन धारण का मूल बात
किसी को ना हो आहत
कि वसन से लज्जा अंग ढके
धारण करने के तरीके पर ना कोई टोके
लेकिन आजकल पाश्चात्य पहनावा मे
चोट पहुंचाता है हमारे भावना मे
फैशन के नाम पर फूहड वसन
का करने लगे ही धारण
—और लज्जा अंगों का करते है प्रदर्शन
तन पर मामूली सा लिपटे रखते है वसन
इस आधुनिकता की होड मे
नारी पुरूष दोनो है ओर छोर मे
हमे इस कुसंस्कृति से बचना होगा
वसन धारण पर पुनर्विचार करना होगा
सभ्य समाज मे वसन की महत्ता
बचाये रखने की है आवश्यकता

चुन्नू साहा पाकूड़ झारखण्ड

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