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सुबह की राख और पहला प्रहार

सुबह मिहार में कभी इतनी भारी नहीं उतरी थी।
सूरज उगा ज़रूर, लेकिन उसकी किरणें गाँव पर नहीं—
मानो किसी अजनबी मैदान पर पड़ रही हों।
हर तरफ़ अजीब-सी ख़ामोशी फैली थी,
जैसे रात ने कुछ छुपाकर रखा हो
और सुबह उसे ढूँढ नहीं पा रही हो।

  1. चौपाल की राख
    ख़बर सबसे पहले चौपाल से आई।
    जली हुई लकड़ी की तीखी गंध
    गाँव के हर घर में घुस रही थी,
    कह रही थी—
    कुछ सच जल चुका है
    और कुछ छुपा दिया गया है।
    चौपाल आधी बेचारी बन चुकी थी—
    जैसे किसी ने आग तो लगा दी हो,
    पर आग को पूरी तरह फैलने से पहले
    बुझा भी दिया गया हो।
    सरगई वहाँ खड़ी थी,
    उसकी आँखें चौपाल पर नहीं—
    उस रात की तहों में दबी
    किसी अनकही चीख़ पर टिकी थीं।
    एक जली लकड़ी पर
    उसने उँगली से एक निशान दिखाया—
    “३२”
    उम्र? तारीख़?
    या किसी नियोजित सूची का नंबर?
    लकड़ी अब भी गुनगुनी थी,
    जैसे उसे
    कुछ देर पहले ही छुआ गया हो।
  2. चंदभान का उतरता डर
    चंदभान जैसे ही चौपाल पहुँचा,
    वह तुरंत समझ गया—
    यह आग किसी ग़ुस्से का नतीजा नहीं थी।
    यह आग एक संकेत थी।
    एक संदेश।
    लेकिन संदेश किसका था?
    और किसके लिए?
    रात की फुसफुसाहट
    अब सच बनकर बाहर आ रही थी।
    उसने धीमे से सरगई से पूछा—
    “कुछ देखा तुमने?”
    सरगई ने जली लकड़ी आगे बढ़ाई।
    “इसका मतलब आपको पता है?”
    चंदभान की आँखें चौड़ी हो गईं।
    ३२…
    वह संख्या उसे बहुत अच्छी तरह याद थी।
    पुरानी फ़ाइल का कोड—
    जिसमें उन ३२ लोगों के नाम थे,
    जिनकी वजह से
    मिहार का पहला नरसंहार हुआ था।
    और जिनके बारे में
    आज तक कोई नहीं जानता।
    लेकिन वह फ़ाइल तो
    बंद संदूक़ में थी…
    तो यह संख्या यहाँ कैसे?
    उसकी उँगलियाँ काँप उठीं।
  3. जुमना का सन्नाटा
    उधर जुमना पूरे गाँव में
    नज़रें ज़मीन से चिपकाए घूम रहा था—
    जैसे कुछ ढूँढ रहा हो
    या कुछ देखने से बच रहा हो।
    कुछ लोग कहते थे,
    वह रात को कुएँ के पास था।
    कुछ कहते थे,
    उसने किसी को
    झाड़ियों में दबे पाँव जाते देखा था।
    जुमना कुछ नहीं बोलता था।
    पर उसकी चुप्पी इतनी भारी थी
    कि लोग उससे
    नज़र मिलाने से डरने लगे थे।
    क्योंकि उसे पता था—
    आग किसने लगाई, यह नहीं…
    आग किसने दिखाई, यह सच है।
    और वह सच उजागर करने से
    डर रहा था।
  4. रूणी के घर का अनचाहा मेहमान
    रूणी घर लौटी तो देखा—
    दरवाज़े पर इस बार काग़ज़ नहीं था।
    एक छोटा-सा मिट्टी का ढेला रखा था।
    ढेला उठाते ही टूट गया,
    और उसके भीतर से
    एक काला धागा निकला।
    वही धागा—
    जो मिहार की दक्षिणी पहाड़ी पर
    रात के पहरेदार पहनते थे।
    और जो किसी के घर
    तभी छोड़ा जाता था
    जब चेतावनी देनी हो—
    “अब तेरी बारी है सच बोलने की।”
    रूणी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
    उसे रात का वह काग़ज़ याद आया—
    “जब सच्चाई बाहर आएगी,
    तो मिहार की मिट्टी ख़ामोश नहीं रहेगी।”
    अब मिट्टी बोल रही थी।
    और बहुत तेज़ बोल रही थी।
  5. पहला प्रहार
    इसी बीच गाँव के उत्तर छोर से
    एक चीख़ गूँजी—
    “भागो!
    कुएँ के पास!
    कोई गिरा पड़ा है!”
    लोग दौड़ते हुए पहुँचे।
    कुएँ के पास घनी झाड़ियाँ थीं।
    उन्हीं में से
    एक आदमी की बाँह बाहर निकली हुई थी।
    लोगों ने उसे खींचा।
    वह ज़िंदा था।
    लेकिन उसकी पीठ पर
    कोयले से वही संख्या लिखी थी—
    “३२”
    और उसके बगल में,
    मिट्टी पर उँगलियों से लिखा था—
    “पहला शुरू हो चुका है।”
    आर एस लॉस्टम

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