
जिस भारतीय समाज में पौराणिक मान्यता है कि जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता वास करते हैं। लगता है समय के साथ अप्रासंगिक हो गया है। तभी कन्या भ्रूण हत्या और लिंग परीक्षण जैसे सामाजिक मुद्दे प्रकाश में आने लगे हैं। क से कात्यायनी भी होता है और क से कन्या का कत्ल जैसे शब्द भी घढे़ जा सकते हैं। निर्भर करता है आपकी मानसिकता पर और सामाजिक चेतना पर। अभी इस महीने के अंत में सभी आध्यात्मिक कहे जाने वाले लोग चैत्र नवरात्रि में कलश पूजन के साथ देवी का आह्वान करेंगे और अपने परिवार के मंगल की कामना देवी से करेंगे लेकिन जब वही देवी कन्या रुप में घर आ
जाए तो उसे कभी दहेज के नाम पर तो कभी निर्भया के नाम पर बलि चढ़ा देंगे। लेकिन नवरात्रि में उसके पूजन का स्वांग जरूर करेंगे। करनी-कथनी का यही अन्तर तो सामाजिक मुद्दों को जन्म देता है। मुझे तो बहन और पुत्री के ना होने का मलाल है। कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराईयां हमारे सभ्य समाज के माथे पर कलंक हैं। कन्या बचेगी तो संतति रहेगी और कन्या नहीं बचेगी तो संस्कार मिटेगा, सभ्यता नहीं रहेगी और सृष्टि अवरुद्ध होगी। आओ एक सामाजिक पहल के साथ इस लेख को एक मुकाम दें।
लोकेश कौशिक











