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उसके भीतर

वह सामने बैठा था, और मैं उसे देखती रही,
पर सच ये है—उस पल मैं ख़ुद को खोजती रही।

उसकी बातें शोर नहीं थीं, सुकून बनकर आईं,
कानों से नहीं उतरीं, सीधे दिल में बोती रहीं।

मैं सोचती रही—यह सवाल क्यों नहीं करता,
कितनी बार उलझाया, अधूरा छोड़ा

अगर वह ग़ुस्से में होता तो शायद कुछ कह पाती,
उसकी शांति ही थी, जो मुझे भीतर से तोड़ती रही।

कितनी बार पास आकर दूरी चुन ली मैंने,
उसकी आँखों में जो जवाब था, उनसे नज़र चुराती रही।

मैंने उसे कभी कम चाहा—ये झूठ नहीं था,
पर उसके प्रेम की ज़िम्मेदारी से मैं डरती रही।

जब उसने कहा—“अगर मेरा प्रेम बोझ लगा हो”,
मेरे भीतर की दीवार एक पल में गिरती रही।

बोझ वह नहीं था, बोझ मेरी कमज़ोरी थी,
ख़ुद को पूरा सौंप न पाने की सज़ा ढोती रही।

आँखें भर आईं, पर आँसू गिरने न दिए,
कि वह फिर मेरे दुख को अपनी गलती समझती रही।

काश प्रेम थोड़ा कम होता, या मैं साहसी होती,
यही एक दुआ हर साँस के साथ चलती रही।

“मैंने तुम्हें कभी बाँधा नहीं”—जब उसने कहा,
मेरे भीतर अपराध की लहर उठती रही।

सच ये है—मैं बँधना चाहती थी, पर डरती रही,
डरती रही कि “हाँ” कह दूँ तो राह लौटने की मिटती रही।

आज उसकी आँखों में कोई माँग नहीं थी,
बस ठहराव था—और वही मुझे सुरक्षित लगती रही।

मैंने उसके हाथ पर हाथ रखा, शब्द कम पड़ गए,
और पहली बार सच मैंने ख़ुद से भी कहती रही

तुम्हारा प्रेम कभी झूठा नहीं था,
यह बात मुझे उम्र भर के लिए हल्की करती रही।

आर एस लॉस्टम

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