
झरे पुराने पात , नव कलियां फूटी हैं….
हुई लताएं कुसुमित, आम्र मंजरियां झूली हैं ।
करती कोयल मधुर गान, प्यारे गीत सुनाती है…
फूले वन उपवन, हर डाल खुशबू सी महकाती है।
संग भीनी-भीनी…. खुशबू के,
हवा भी… मंद मंद मुस्काती है।
मन वीणा पर… सुर प्रणय के,
प्रेम उल्लास का… संदेशा दे जाती है।
रोम-रोम पुलकित हुआ प्रकृति का,
आई उसमें….. तरुणाई है।
नव कोंपलों के….अधर रसीले…
मधु पराग की ….अधिकाई है।
आंगन में उतरी ….धूप केसरी..
नव ऊर्जा का… संचार कर रही।
बोझिल मन भी… खिल बौराएं…
रीत प्रीत के… राज खोल रही।
उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून ( उत्तराखंड )











