
(१) भ — भक्ति और भाव का स्वरूप
“भ” से भक्ति जन्म लेती, मन हो जाता शांत,
ईश्वर स्मरण करे जो, मिट जाए भय-भ्रांत।
जहाँ प्रेम और नम्रता हो, वहाँ जगता प्रकाश,
“भ” सिखाए — सच्ची श्रद्धा में होता भगवान का वास।
(२) ग — ज्ञान और गहराई का प्रतीक
“ग” से ज्ञान का दीप जले, मिट जाए अज्ञान,
सत्य, विवेक और धैर्य से बने जीवन महान।
जो भीतर की ज्योति जगाए, वही गुरु का मान,
“ग” कहता — ज्ञान पर भरोसा करो, ईश्वर है महान।
(३) व — विश्व चेतना और विस्तार
“व” से व्याप्त हुआ जग सारा, बहती एक ही श्वास,
पेड़, नदी, पर्वत, पंछी — सबमें परम-प्रकाश।
जो सबको समान समझे, वही सत्य का ज्ञान,
“व” बताता — हर जीव में ईश्वर लेता निवास महान।
(४) आ — आत्मा और अनंत स्वरूप
“आ” से आत्मा की पहचान, भीतर है भगवान,
ध्यान, मौन और शांति में मिलता अद्वैत ज्ञान।
जो स्वयं को पहचान लेता, वही पहचानता संसार,
“आ” कहता — ईश्वर बाहर नहीं, भीतर ही साकार।
(५) न — नित्य, निर्गुण और नियम
“न” से नित्य, अनादि स्वरूप, जो जन्म-मरण से दूर,
कर्म-फल का नियम वही, न्याय का शाश्वत सूर।
सेवा, सत्य और करुणा में छिपा उसका विधान,
“न” कहता — जो सदा रहे, वही सच्चा भगवान।
ईश्वर कहीं दूर नहीं, हर हृदय में नित प्रकाश,
सत्य, प्रेम और करुणा में मिलता उनका वास।
जो अंतर्मन को पवित्र करे, वही पूजा महान,
जहाँ दया और सेवा हो — वहीं मिलता भगवान।।
योगेश गहतोड़ी “यश”











