
टूट कर जब गिरा दूर
कर गया वह बड़ी भूल
सोचा था मिलेगा प्यार
मिले धक्के और शूल
तड़पकर याद करता रहा
ढूंढता रहा उसे दूर – दूर
हर घड़ी हर पल धूल-धूल
हो बेदम और चकनाचूर
कम न होने दी उम्मीदें
विश्वास था मिलेगा जरूर
दुर्भाग्य ! से तोड़ा था दिल
चला था दूर हो के मगरुर
जमाने की ठोकरें खाकर
पड़ा था वह बहुत दूर
देखा उसे बेदम वेदना में
घमंड हुआ था चकनाचूर
उठाया प्यार से जब उसको
तो देखा उसमे है सच्चा नूर
आज है कल चला जाएगा
मत सोच तू ही है एक हूर
डॉ .कृष्ण कान्त भट्ट
एस वी पी सी बैंगलुरू कर्नाटक











