
मैं अकेला ही चला था अपनी मंज़िल पाने को,
रास्ते में कुछ लोग मिल गए हाथ बढ़ाने को।
कुछ ने मेरा बोझ उठाया, कुछ बोझ बन गए,
हर क़दम ने आज़माया मुझे आगे बढ़ाने को।
चाँद की ख़्वाहिश सदा थी थोड़ी रौशनी के लिए,
पर अँधेरों ने ही सिखला दिया आशियाना बनाने को।
जिसे चाहा था, वही कुछ दूर आकर मुकर गए,
वक़्त ने रोका नहीं किसी को साथ निभाने को।
सारी उम्र जिसे हम तरसते रहे पाने को,
वही सबसे दूर निकला मुझे ख़ुद से मिलाने को।
टूटकर भी न रुका दिल अपने इरादे से कभी,
दर्द ही काम आया मुझे मज़बूत बनाने को।
लॉस्टम अब किसी से कोई शिकवा नहीं रहा,
अकेलापन ही काफ़ी है सच पहचानने को।
आर एस लॉस्टम











