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कर्तव्य

कर्तव्य वह अग्नि है, जो भीतर चुपचाप जलती है,
स्वार्थ की ठंडी छाया को साहस से पिघलाती है।
यह बोझ नहीं, इस जीवन का सच्चा सम्मान है,
यह आत्मा का कर्मरूप, ईश्वर का ही विधान है।

जब मन थककर बैठ जाए, राहें धुंधली हो जाएँ,
कर्तव्य दीपक बनकर फिर जीवन-पथ दिखलाए।
यह शोर नहीं करता, बस भीतर शांत स्वर देता है,
“उठो, अभी कर्म शेष है” — चुपचाप कह देता है।

यह फल की चाह नहीं रखता, बस कर्म निभाता है,
सूर्य समान प्रतिदिन अपना प्रकाश लुटाता है।
निंदा हो या स्तुति, इससे पथ नहीं बदलता है,
सत्य चरणों में ही इसका जीवन नित ढलता है।

कर्तव्य वही जो निज धर्म से जन्म लेता है,
जो लोकमंगल हेतु स्वयं को अर्पित करता है।
जहाँ अधिकार से पहले उत्तरदायित्व निभाता है,
वहीं मनुष्य के भीतर देवत्व का दीपक जलता है।

माता की ममता में कर्तव्य का मधुर भाव है,
पिता के त्याग में ही, इसका मौन प्रभाव है।
गुरु की दृष्टि में यह, ज्ञान का अनुशासन है,
सैनिक की शपथ में, यह जीवन का समर्पण है।

कर्तव्य न हो तो स्वतंत्रता भी भ्रम बन जाती है,
कर्तव्य हो तो कठिनाई भी तप बन जाती है।
यह आत्मा की प्रतिज्ञा है, यह जीवन का धर्म है,
कर्तव्य ही मनुष्यत्व का सबसे उज्ज्वल कर्म है।

जब “मैं” पीछे हटता है और “हम” आगे आता है,
तभी कर्तव्य का कमल, हृदय में खिल पाता है।
यह भावचतुष्टय के पंचविश्वास का तृतीय प्रकाश है,
यही मानव जीवन को मानव से महापुरुष बनाता है।

कर्तव्य से मानव भीतर, संतोष-जागरण पाता है,
स्वार्थ-सीमाएँ त्यागकर, नित लोकधर्म निभाता है।
जब यही भाव शब्द बन, जीवन साधना बन जाता है,
कर्तव्ययुक्त साहित्य ही, युग-पथ प्रकाशित करता है।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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