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प्रेम-लहर

भाव बिन प्रेम कहां
प्रेम है तो भाव वहां
प्रेम करो चाहे जीवात्मा से
या करो परमात्मा से
भाव से ही प्रेम उपजे
सत्य भाव यदि हृदय में
प्रेम वल्लरी की छटा निराली
प्रिय दूर नहीं सत्य भाव हों जहां
प्रेम सरिता में प्रवाहित मनोद्गार
बुद्धि चले संग तब
प्रेम लहर हो विचलित …मन न करे स्वीकार ।
बुद्धि चले तो हृदय कोमलता हर ले
सत्य प्रेम ही भक्ति का आधार

सत्य अनुभूति बिन विकसित नहीं हिय में प्रेम ।
पशु-पक्षी भी हो प्रेम की भाषा करें महसूस
सत्य प्रेम भाव के वे भी अभिभूत
प्रेम ही प्रिय प्रणय आधार
प्रेम बिन ये जगत निस्सार।

महेश शर्मा, करनाल

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