
यह केवल शब्दों की लड़ाई नहीं, यह अस्मिता की पुकार है।
यह केवल व्याकरण नहीं, यह संस्कृति का श्वास है।
यह केवल भाषा नहीं—यह हमारी हिंदी है।
आज जब डिजिटल युग में संवाद तेज़ है, तब हिंदी कहीं हाशिये पर खड़ी दिखती है। हम गर्व से कहते हैं कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, पर व्यवहार में उसे पीछे छोड़ देते हैं। प्रश्न यह नहीं कि हम कितनी भाषाएँ जानते हैं—प्रश्न यह है कि अपनी भाषा को कितना सम्मान देते हैं।
हिंदी वह सेतु है जो गाँव से शहर को, अतीत से वर्तमान को और संस्कृति से संस्कार को जोड़ती है। यह तुलसी की रामायण में भी है, कबीर की साखियों में भी; यह प्रेमचंद की कहानियों में भी है और आज के जनसंचार में भी। हिंदी केवल अभिव्यक्ति नहीं, एकता का आधार है।
आज आवश्यकता है कि हम हिंदी की अलख जगाएँ—
घर में, विद्यालय में और समाज में हिंदी को सम्मान दें।
शिक्षा में हिंदी को केवल विषय नहीं, संवेदना बनाएँ।
डिजिटल मंचों पर हिंदी को अपनाएँ, आगे बढ़ाएँ।
बच्चों को यह सिखाएँ कि हिंदी बोलना कमजोरी नहीं, पहचान है।
याद रखिए, भाषा तभी जीवित रहती है जब उसे बोला जाए, लिखा जाए और जिया जाए।
आइए, संकल्प लें—
हिंदी बोलेंगे, हिंदी लिखेंगे, हिंदी पर गर्व करेंगे।
क्योंकि जब हिंदी बचेगी,
तभी हमारी संस्कृति, हमारी एकता
और हमारी पहचान बचेगी।
— हिंदी की अलख जलाए रखें।
डॉ आकांक्षा रुपा चचरा
गुरु नानक पब्लिक स्कूल
कटक ओड़िशा











