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निष्ठा- कहानी

गाँव के छोर पर एक प्राचीन पत्थर का मंदिर था, जिसकी दीवारों पर समय की लकीरें साफ़ दिखती थीं। वहाँ न बड़े आयोजन होते थे, न भीड़ उमड़ती थी; फिर भी हर शाम को उसी गाँव की एक दादी रोज़ एक दीपक अवश्य जलाती थीं। वह दीपक केवल रोशनी नहीं, बल्कि निष्ठा का प्रतीक था। लोग कहते थे कि मंदिर की परंपरा वर्षों से चल रही है, पर सच यह था कि उस परंपरा की साँस गौरी दादी की निष्ठा से चलती थी। उनका मानना था कि पूजा का मूल्य भीड़ से नहीं, निष्ठा से तय होता है।

गौरी का जीवन साधारण था, पर उनकी निष्ठा असाधारण थी। सुबह वह अपने छोटे से आँगन में तुलसी को जल देतीं, दो रोटियाँ बनातीं और दिन भर घर-गृहस्थी के कामों में लगी रहतीं। शाम होते ही वह अपनी पुरानी चुन्नी ओढ़तीं, पीतल की छोटी डिब्बी में तेल-बाती रखतीं और मंदिर की ओर चल पड़तीं। कई बार बुखार होता, घुटनों में दर्द उठता, पर उनकी निष्ठा शरीर की सीमाओं से बड़ी थी। वह कहतीं, “जब तक साँस है, निष्ठा की लौ जलती रहनी चाहिए।”

एक वर्ष गाँव पर महामारी का साया छा गया। लोग घरों में बंद हो गए, रास्ते सुनसान पड़ गए और मंदिर का आँगन वीरान हो गया। कई लोगों ने गौरी को समझाया, “दादी, अब मंदिर जाना छोड़ दो, भगवान घर से भी मान लेंगे।” गौरी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “भगवान को मनाना मेरा उद्देश्य नहीं, अपनी निष्ठा निभाना उद्देश्य है।” महामारी से गाँव वाले डरे हुए थे, पर गौरी की निष्ठा और भी स्थिर हो गई। सूने मंदिर में जब वह दीपक जलातीं, तो लगता जैसे अंधेरे के बीच निष्ठा की एक जिद्दी ज्योति प्रज्वलित हो रही हो।

फिर एक रात भयंकर तूफ़ान आया। बादल गरजे, बिजली चमकी और हवा के थपेड़ों से खिड़कियाँ हिलने लगीं। गाँव वालों ने दरवाज़े बंद कर लिए। सबको विश्वास था कि आज गौरी भी नहीं निकलेंगी, पर निष्ठा डर का हिसाब नहीं लगाती। अपनी लाठी के सहारे, भीगती चुन्नी और काँपते कदमों के साथ वह मंदिर पहुँचीं। अंदर घुप्प अंधेरा था। उन्होंने काँपते हाथों से दीपक जलाया। हवा के झोंके से लौ डगमगाई, पर उन्होंने दोनों हथेलियों से उसे ढँक लिया। लग रहा था जैसे वह अपनी निष्ठा को बचा रही हों। उस क्षण मंदिर में केवल एक दीपक नहीं, निष्ठा स्वयं जल रही थी।

अगली सुबह जब तूफ़ान थमा, कुछ बच्चे मंदिर देखने पहुँचे। उन्होंने देखा कि दीपक की कालिख अब भी ताज़ी थी। उन्होंने आकर दादी से पूछा, “दादी, आप कल मंदिर गई थीं?” गौरी मुस्कुराईं और बोलीं, “निष्ठा पूछकर नहीं जाती कि रास्ता सुरक्षित है या नहीं।” बच्चों ने पहली बार समझा कि निष्ठा सुविधा की दासी नहीं, आत्मा की आवाज़ होती है। उस दिन से वे भी बारी-बारी से गौरी के साथ जाने लगे।

समय बीता, गौरी की चाल और धीमी हुई, पर निष्ठा की गति कभी धीमी नहीं हुई। एक शाम वह दीपक जलाकर लौ को देर तक देखती रहीं। उनकी आँखों में संतोष था, जैसे निष्ठा अपना काम पूरा कर चुकी हो। कुछ ही दिनों बाद वह इस दुनिया से चली गईं। गाँव शोक में डूब गया, पर मंदिर का दीपक नहीं बुझा। अब हर संध्या गाँव का कोई न कोई व्यक्ति वहाँ दीपक जलाता है, क्योंकि लोगों ने समझ लिया है कि वह केवल रोशनी नहीं, बल्कि निष्ठा की विरासत है।

आज भी गाँव के बुज़ुर्ग बच्चों से कहते हैं, “दीपक की लौ छोटी होती है, पर निष्ठा उसे अमर बना देती है।” उस मंदिर में जलता हर दीपक यही संदेश देता है कि निष्ठा वह शक्ति है जो अकेलेपन में भी साथ देती है, अंधेरे में भी दिशा देती है और जीवन को साधारण से पवित्र बना देती है। जहाँ निष्ठा की ज्योति जलती है, वहाँ विश्वास को कभी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।

यह कहानी सिखाती है कि निष्ठा परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती। सच्ची निष्ठा वह है जो भय, अकेलेपन, बीमारी या कठिनाई में भी अपने कर्तव्य और विश्वास से पीछे नहीं हटती। गौरी दादी का दीपक केवल एक धार्मिक कार्य नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि जब मन अडिग रहता है, तब छोटा सा कर्म भी युगों तक प्रेरणा बन जाता है। निष्ठा ही वह शक्ति है जो साधारण जीवन को भी असाधारण बना देती है।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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