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दारू का जीवन


छत्तीसगढ़ी गीत

दारू मीठ–मीठ हँसाथे, पाछू आँसू दे जाय,
घर–अंगना ल खाय धीरे, जिनगी राख बना जाय।

पहिली–पहिली दोस्त कस लागे, मन ला खूब रिझाय,
घूंट–घूंट म जहर घोले, सुध–बुध सब बिसराय।
कमइ के जे पसीना रहिथे, बोतल भीतर बोह जाय,
लइका–सियान भूखे रहिथें, नशा गीत गवाय।

दारू मीठ–मीठ हँसाथे, पाछू आँसू दे जाय…

मया–धरम के डोरी टूटे, घर म झगरा छाय,
मइया के आँखी रोवय, ददा ल लाज न आय।
सपना मन हा धुर्रा होथे, रद्दा बंद हो जाय,
इंसान रहिके घलो मनखे, अपन रूप बिसराय।

दारू मीठ–मीठ हँसाथे, पाछू आँसू दे जाय…

थोड़े म हँसी देथे संगी, जादा म अपमान,
चढ़त नशा म गिर जाथे, मनखे के सम्मान।
जीभ म मीठास राखे, भीतर भारी जाल,
जे धर ले ए संगत ला, ओकर बुरा हाल।

दारू मीठ–मीठ हँसाथे, पाछू आँसू दे जाय…

आज कसम ले संगी मोर, नवा बिहान जगाव,
नशा छोड़ के मेहनत धर, घर म दिया जलाव।
जेन नशा ल त्याग के जियय, उही सही इंसान,
ओकर घर म सुख बरसय, बढ़े मान–सम्मान।

दारू मीठ–मीठ हँसाथे, पाछू आँसू दे जाय,
छोड़ दव ए जहर संगी, जिनगी फूल बन जाय।

रचनाकार
कौशल
छत्तीसगढ़

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