
मोहब्बत की हसीं महफ़िल लुटा गए वो लम्हे,
दिए जो ज़ख्म गहरे थे, रुला गए वो लम्हे।
कभी जो धूप में भी बादलों की छाँव लगते थे,
वही अब आग बनकर दिल जला गए वो लम्हे।
हमें मालूम ही न था कि साये छूट जाएँगे,
न जाने किस समंदर में गँवा गए वो लम्हे।
हज़ारों वादे थे उनके, हज़ारों कसमें थी दिल की,
इबादत की तरह मुझको मिटा गए वो लम्हे।
सुबह की आस में हम उम्र भर जागे रहे ‘साथी’,
मगर गहरी काली रातों में सुला गए वो लम्हे।
जो दिल के पास रहते थे, दगा दे गए वो लम्हे,
हँसी छीनी लबों से और रुला गए वो लम्हे।
बड़ी मुद्दत से आँखों में कोई सपना नहीं जागा,
कि नींदें मेरी पलकों से चुरा गए वो लम्हे।
सजाई थी जो महफ़िल हमने, एक साथ मिलकर के,
वो महफ़िल आज यादों की सजा गए वो लम्हे।
रीना पटले, शिक्षिका
शास हाई स्कूल ऐरमा,कुरई
जिला सिवनी – मध्यप्रदेश











