
निरीह प्राणी हो
या संकट ग्रस्त हो कोई जन
वक्त पर उसे सहायता मिल जाए
बस ! पूछो न उस के मन की
उस की खुशी में प्रेम छिपा
उस के हृदय देव छिपा
तब दिल से वो दे दुआ !
दुआ का जग में मोल नहीं
कृतज्ञता से बढ़ के बोल नहीं।
बिन कामना के–
सत्कर्म भाव जिसके हृदय समाए
देवतुल्य वो जग में कहलाए।
दुआ न कभी खाली जाए
वक्त पर वो काम कर जाए
न जाने कौन दुआ कब काम आ जाए
जब तुम चहुं दिस निराश
देव तुम्हारे का … जन-जन में वास ।
दुआ और आशीष हैं समानांतर
आशीष मात-पिता की
रब से नहीं कमतर ।
पूजा-पाठ भी तभी साकार्थ
मन सहिष्णु और सेवा भावना निःस्वार्थ !
महेश शर्मा, करनाल











