
जब ठंडी वादियों में सन्नाटा, हिम चादर ओढ़े वन सोते हैं,
नीरव खड़े पहाड़ों के मन में मौन के बादल तब होते हैं।
तब मैं बुराँश वृक्ष बन, लाल रंग में चुपचाप मुस्काता हूँ,
जमे हुए जीवन की धड़कन बन हर सूनी डाल जगाता हूँ।
मैं बस फूल नहीं, वसंत का पहला उजियारा कहलाता हूँ,
सूखी रगों में बहते रक्त-सा पर्वतों में प्राण जगाता हूँ।
जब बर्फीली साँसें धरती की हरियाली को रोक जाती हैं,
तब लाल दीप बन मैं ही उसकी जीवन-ज्योति कहलाता हूँ।
जब पगडंडियाँ थककर चुप होतीं, चरवाहे गीत नहीं गाते,
जब बादल भी पहाड़ों की चोटी पर बोझिल होकर छाते।
तब मेरी पंखुड़ियों की लाली कहती — “अभी अंत नहीं है”,
पत्थर-दिल मौसम के भीतर भी धड़कता वसंत यहीं है।
मैं हूँ पहाड़ की धड़कन, मैं हूँ वादियों की मुस्कान,
मेरी छाँव तले पलता है हर सपनों से भरा अरमान।
मेरे रस-रस में घुली हुई है मिट्टी की गहरी तासीर,
थके हुए तन-मन को देती जीवन की नई लकीर।
मैं औषधि भी हूँ, प्रेम भी हूँ, पर्वत की पावन पहचान,
मेरे रंग में ही घुला हुआ है संघर्षों का गौरवगान।
सूखी शाखों को फिर से जीना हर बसंत मैं सिखलाता हूँ,
पत्थर-दिल मौसम के भीतर भी आशा-दीप जलाता हूँ।
जब धरती माँ थक जाती है, बोझिल हो उठता संसार,
तब मैं उसके माथे पर बन सिंदूरी-सी आशा साकार।
मेरी लाली कहती रहती — “जीवन फिर मुस्काएगा”,
हर कठिन सर्दी के बाद नया वसंत ज़रूर आएगा।
हे पर्वत! जब तेरे मन में निराशा का अंधियारा छाए,
जब ठंडी हवा तेरे साहस की लौ को डगमगाए।
तब मेरी ओर नज़र उठाना, मैं फिर से खिल जाऊँगा,
तेरी ही गोद में हर वर्ष नया जीवन लिख जाऊँगा।
हे पर्वत! जब तेरे मन में निराशा का अंधियारा छाए,
जब ठंडी हवा तेरे साहस की लौ को डगमगाए।
तब मेरी ओर नज़र उठाना, मैं फिर से खिल जाऊँगा,
तेरी ही गोद में हर वर्ष नया जीवन लिख जाऊँगा।
योगेश गहतोड़ी “यश”
नई दिल्ली – 110059











