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विप्रलंभ शृंगार की छायावादी रचना –भ्रमर-प्रणय

मिले ऊर्जा भंवरे को
तेरी आगोश में
हे ! शतदल तेरी सुगंध में खोया
ये प्रणय-सा प्रेम समर्पण चिरकाल से
भ्रमर ने ये गुनगुनाती जिंदगी
जी– बस मदहोश में ।

न तपस की चिंता
न शीत बयार की
भ्रमर बस गीत गुनगाए
जिंदगी में —
आत्मसमर्पण ही जिंदगी
प्रेम के इज़हार की ।

संग न छूटे चाहे हिम कण बरसें
चिंता नहीं शीत की — निशा के अंधकार की
प्रेम के लिए समर्पित ये जिंदगी
हिय में उपजे बस प्यार की
कड़कती ठंड में तेरी बाहों खो जाए
उगते सूर्य की रश्मियां–बतायें
गाथा तेरे बलिदान की ।

प्यार में समर्पित कर दी भंवरे ये जान भी
जिंदगी वहीं
वहीं तेरा जहां
प्रिय का संग जहां
कैसे हो जाएं तन्हां
जिंदगी कर दी फनां
परवाह नहीं की है जान की
बस परवाह की
हिय में धड़कते प्रेम के उद्गार की ।

                   -महेश शर्मा, करनाल

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