
सर्वत्र खुशी जब छा जाती है
निधियां पा ले जो जन अनंत
दुख दर्द सभी हो जाते दूर
जब मन में खिलता है बसंत।।
जब सरसों पीली हो जाती है
है भंवरे करते ,गुन गुन गुंजन,
गेहूं की फसल लहलहाती है
जब मन में खिलता है बसंत।।
बागों में आम खिल जाता है
कोयल करती कुहु कुहु कूजन,
रति पति करता है शर संधान
जब मन में खिलता है बसंत।।
तब ठंडक भी कम हो जाती है
खिल उठना है सब दिगदिगंत,
सब जगह सुखद तब लगता है
जब मन में खिलता है बसंत।।
पुष्पा पाठक छतरपुर मध्य प्रदेश











