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गुण-दुर्गुण

क्षमाशील जो जन
उच्चतम महान क्षमा भाव ये गुण
गुण पूर्वजन्म के कर्मों का फल
क्षमाशील नहीं जो जन
सामाजिक समरसता से वंचित
ये ही सत्य अटल।

क्षमाभाव अद्वितीय है, इस जैसा
कोई नहीं गुण।
सद् गुण वृद्धि होती जाए उसके मन ।
गुण स्वभाव में आएं
वंशानुगत ये गुण ।
जन्मसमय में आएं ग्रहण करे मन ।
वातावरण भी उपजाए ….गुण- दुर्गुण
वंशावली में चले पीढ़ी दर पीढ़ी ये गुण ।

प्रथम गुरु है माता
द्वितीय शिक्षक गुरुजन
इन की सीख ही जीवन का तर्पण।
क्षमाशील का मान बढ़े
जगत में सन्निकटता आए
दुर्जन दुर्बुद्धि बिन दंड के नियंत्रण न आए
अपने कर्मों भोग अवश्य करेगा
गीता में कहे श्रीकृष्ण।

गुण सत्कर्म से उपजें, हो रब का वरदहस्त ।
एक दिन उसके शत्रु–

उसके दृढ़ सद् गुण समक्ष हों नतमस्तक ।

महेश शर्मा, करनाल

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