
चल देता मानव कर्मपथ अपने ,
बाहर निकला जब है द्वारे पर ।
पड़ा मन जब है असमंजस में ,
मानव खड़ा अब है दोराहे पर ।।
मानव चला तो था एक मार्ग पे ,
मार्ग दो भाग में विभाजित हुए ।
सारे रास्ते थे देहाती पगडंडी ,
पथिक वहीं पे अचंभित हुए ।।
ठिठका वहीं पर अब पथिक ,
अपनाऊॅं कौन सा सुगम पथ ।
कैसे चलेगी यह जीवन नैया ,
कैसे बढ़ेगा मेरा ये जीवन रथ ।।
खेतों के पथ सकरे कंकरीले ,
खेतों के बीच फसलें बचाना ।
हाय रे जीवन तू कितने दुष्कर ,
इंसानी कृषि में मार्ग बनाना ।।
बचाकर रखनी है हरियाली
कंकड़ पत्थर काॅंटे बचाना है ।
रखने हैं फूॅंक फूॅंक के कदम ,
धीरे धीरे आगे बढ़ते जाना है ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।











